दिल्ली।

उम्मीदों का शहर।

आशाओं का शहर ।

शहर सपनों का।

ऐसे ही कुछ चमकीले सपने,

कुछ जगमग ख्वाहिशें लिए

आई थी मैं इस शहर –

सतरंगे सपनों के धागे लिए।

और धागों के दूसरे छोर पर –

अथाह आकांक्षाओं के आसमान में 

स्नेह से चाँद-सितारे जड़ता,

इन्द्रधनुषी रंगो को पिरोता,

करघे पर लगा था एक बुनकर।

सपने देखना उसी से सीखा मैंने,

और सीखा गाँठों को सुलझा लेना।

ज़िद देखी – हर हाल में 

सच का ताना-बाना बुनते देखा उसको। 

सपनों के उस बुनकर को

सपनों की उसी दिल्ली में 

स्वधा कर आई मैं।

और उसके सपने?

सपने कब स्वाहा होते हैं!

कब मानते हैं सपने

शहरों की सीमाओं को।

वो तो अबाध उड़ते हैं, 

उड़ते रहेंगे,

क्षितिज के उस पार भी…