सर्वव्यापी होती थीं हमारे बचपन में

गोदरेज की अलमारी। 

हर घर की बुनियादी ज़रूरत;

माँ की, चाची-मासी-आँटी की बेडरूम में

शायद सबसे ज़्यादा महत्व 

इन अलमारियों का ही होता था।

मज़बूत, चोरों को चकमा देने में सक्षम,

बड़ी भरोसेमंद मानी जाती थीं

गोदरेज की वो अलमारियाँ।

मजाल है कि खुल जाए किसी और चाबी से

या टूट जाए पहलवानों के भी ज़ोर से!

उनमें जो सामान रख दिया,

सदा के लिए सुरक्षित समझो –

सो घर की सारी महत्वपूर्ण चीज़ें

इन अलमारियों के सुपुर्द कर दी जाती थीं।

हमें तो जादुई पिटारा लगतीं थीं-

सिल्क की साड़ियाँ, 

पार्टी में पहनने की हमारी ड्रेस,

कशीदे-कढ़ाई वालीं चादरें, कश्मीरी शालें-सूट,

फ़ैन्सी बैग, पुराने एल्बम, अत्यावश्यक काग़ज़ात…

बिस्तर के गद्दे के नीचे छुपाई चाबी से

खुलने वाले लॉकर में रखे कुछ ज़ेवर,

माँ-पापा की एक-दूसरे को लिखी

सालों पहले की चिट्ठियाँ….

हर कुछ दिनों में उन अलमारियों में घुस 

उन चीज़ों की तफ़तीश करने में

किसी ख़ज़ाने को पा लेने सा आनंद आता था।


बचपन की मीठी-चटपटी यादों भरी

उन्हीं गोदरेज की अलमारियों में 

सबसे ख़ास एक ख़ज़ाना 

अपने आप ही आ बैठा है।

वो, जिसने सादी, सपाट, उदास सी 

पुरानी अलमारियों में रंग भर दिया।

स्टील के उन पलड़ों पर फूल उकेर कर

बिनौलों सी उड़ गई जो…

उसकी उन्मुक्त खिलखिलाहट

उसी के रंगे फूलों में सज गई है –

जादुई पिटारे के सबसे उपर, रौशनी में….

दिल के रिश्ते हालाँकि 

अलमारियों के मोहताज नहीं होते;

यूँ ही सहेज लिए जाते हैं…

फिर भी गोदरेज की हर अलमारी 

अब उसी की हो गई है…