कहीं नाम या नम्बर, कहीं मशीन बन गया
दुनिया में कहाँ रह गया इंसान आदमी।
कर हरकतें अजीब नामचीन बन गया
होकर शरीफ़ रह गया अनजान आदमी।

सड़कों पर उमड़ी भीड़ सोचती है अब खड़ी
लाए कहाँ से रोटी और मकान आदमी।
हर सुख से, हर साधन से और आराम से घिरा
एक ओर घर में होता परेशान आदमी।

दवा क्या अब तो मुफ़्त में मिलती नहीं दुआ
साँसों की क़ीमत भर रहा हलकान आदमी।
रसूख़ के बल फ़ोन पर नम्बर कोई घुमा
ले ढूँढता सिफ़ारिशी पहचान आदमी।

मिल जाएगी कहीं उसे इस मर्ज़ की दवा
आरज़ू ले भटकता है बेज़ुबान आदमी।
बेहाल के उस हाल को ग़ुस्ताख़ियाँ बता
बेदर्द पीटता है बदगुमान आदमी।

लाशों को दफ़्न होने भर मिलती नहीं मिट्टी
कोठी बना रहा है आलीशान आदमी।
लगातार चिताओं से मरघट को कर रौशन
दर-दर बना चुका है अब शमशान आदमी।