बिल्ली!

वो भी काली बिल्ली!

अपशकुन होती हैं।

रास्ता काट लें तो

यात्रा ख़राब हो जाती है,

और तुमने घर में रख ली!

शौक़ ही था तो कुत्ता रख लेती;

ये काली बिल्ली क्यों?!

किसी की नहीं होतीं ये बिल्लियाँ –

न लाड़-लगाव, न मोह,

चुड़ैलों की संगिनी होती हैं।

घर गंदा करेगी तुम्हारा,

घर में सब ख़राब करेगी।

तुम्हारे पास तो वैसे ही समय नहीं रहता,

ये फ़िज़ूल की मेहनत और पाल ली!

अब सोंचा तो हमने भी था पर

हमें लगा था बिटिया का भूत है,

कुछ दिनों में उतर जायेगा।

हमें कहाँ पता था कि

अपने छोटे-छोटे पैरों से घर में आकर,

अपनी चमकती, जादुई आँखों से

हमें वशीकरण का शिकार बना कर

ये हमारे दिल में ही घुस जाएगी।

जब मालूम हुआ तो बहुत देर हो चुकी थी।

सिंडर के माया जाल में

कस कर बंध चुके थे हम।

हाँ सिंडर: काली-नारंगी,

बुझते अलाव के अंगारों सी।

जैसे भी आयी

बहुत सही समय पर घर आयी सिंडर।

बंद दरवाज़ों के सन्नाटे में

हँसी बन कर आयी।

परिवार के साथ बैठ खेलने-खाने की

ख़ुशी बन कर आयी।

सीख बन कर आयी –

सबकी सुनो, पर मन की करो;

शायद आपके अनुभव दूसरों से अलग हों,

ऊँचाइयों से डरो मत –

उन्हें हासिल करो ।

अपनी पूर्वधारणाओं से ऊपर उठो

अपनी दुनियाँ को रंग बदलते देखो।

अपने आसपास सीमायें मत बनाओ,

अपने दायरों से बाहर झाँको

तो पाओगे कि नए अनुभव, नए रिश्ते

नई खुशियाँ संग लेकर आते हैं।

और सिखाया सिंडर ने

हमेशा अपने मन की सुनो –

अच्छा खाओ, स्वस्थ खाओ,

फुर्तीले बने रहो – व्यायाम करो।

पर जम कर आराम भी करो।

निडर बनो, जोख़िम भी उठाओ

पर जख्मों से हार कर बैठ मत जाओ।

जब अकेले से काम न हो

तो बेझिझक मदद के लिए आवाज़ लगाओ।

ख़ुश रहने के लिए

दो-चार करीबी दोस्त ही काफ़ी हैं

बेवज़ह आस पास भीड़ मत लगाओ।

मोहब्बत करो, पर अपनी शर्तों पर।

दूसरों को ख़ुश करने के लिए

अपनी खुशियों की बलि मत चढ़ाओ।

अनचाहे ही ले आये थे हम

इस काली बिल्ली को अपने घर।

अनमने से हम जिसे ले आये

क्या मालूम था इतनी दुलारी हो जाएगी।

असामाजिक सी एक बिल्ली

इतना कुछ सिखा जाएगी।

चिपकना-चाटना पसंद नहीं करती सिंडर,

गोद में बैठ दुलार भी नहीं करती।

लेकिन भावनाओं के उतार-चढ़ाव

भली भांति समझती है। 

उदास हो तो पास आकर बैठ जाती है,

साधारण से लम्हों को

अपनी मौज़ूदगी से ही ख़ास बनाती है।

इन छोटी खुशियों में ही

जीवन का सार है – बताती है।