नारी हूँ मैं, कई रूप हैं मेरे
हाँ हूँ मैं – माँ भी, बेटी भी,
बहन भी, प्रेमिका भी, पत्नी भी,
दोस्त, नौकर, मालिक भी,
ख़ास भी, ख़ारिज भी।

ये दुनिया अक्सर मुझे साँचों में..
खाँचों में छाप देती है।
ये दुनिया
अक्सर अपनी सारी उम्मीदें
मुझ पर ही लाद देती है ।

और मैं
गिरती हूँ, उठती हूँ,
रुकती हूँ, चलती हूँ,
बँटती हूँ, टूटती हूँ, जुड़ती हूँ…
आकांक्षाओं और आशंकाओं के बीच
हिलोरें लेती हूँ।

मुझे कभी
निपट सिर्फ़ मेरे ही सपनों संग बहने दो।
मत बाँधो मुझे
सदा ही रिश्तों में, किश्तों में…
कभी मुझको बस मैं ही रहने दो।