अपनी ज़िन्दगी के कुछ पन्नों को
आज समेटा मैंने।
मिली कुछ पुरानी निशानियाँ।
दोहरायी कुछ भूली-बिसरी,
कुछ ताज़ी भी कहानियाँ।
बिखरी मिली ख़ुद से –
डब्बों, बोतलों, दराज़ों में,
स्याही में, शब्दों में, किताबों में।
पाये पीले से कुछ पन्ने –
फट कर अलग हो चुके थे
मेरे वजूद से वो।
चमकीले कुछ पन्ने –
किसी अनदेखे ख़्वाब से लगे जो।
उन पन्नों में देखा उम्र का बढ़ना।
और देखा शख़्सियत का गढ़ना।
नन्हें हाथों की लेखनी देखी –
फिर समझ की तब्दीली देखी।
उन पुराने पन्नों में देखा
फिर से वो बचपन –
गुड़िया थी जिसमें,
चाँद-तारों की चित्रकारी,
और खिलौनों में भोलापन।
उन्हीं पन्नों मे देखा
अनवरत समय का चलना,
ज्वार का घटना-बढ़ना
और बदलाव का निश्चित होना।
कितना कुछ था
उन थोड़े से पन्नों में!
छिट-पुट बातें,
छितराए से रिश्ते-नाते,
अस्त-व्यस्त जीवन के खाते।
एक अध्याय को
दूसरे अध्याय से कड़ी में जोड़ते;
कभी बहते, बिखरते
किसी और ही कहानी में समाते…
बीते अफ़सानों को,
गुज़रे कल के फ़सानों को
पन्ना दर पन्ना बटोरा मैंने।
अपनी ज़िन्दगी के कुछ पन्नों को
आज समेटा मैंने।