आँखें खुलने से भी पहले
कुछ बातें मन में आतीं हैं
ये बातें कल की बासी शामें
सपने में कह जाती हैं

रोज़ की फ़ेहरिस्त से, मसरूफ़ी में फिसलती जाती बातें
कर काम तमाम, तसल्ली से कर लेंगे, में हैं टल जाती बातें
दिन भर मन के दरवाज़े से
ये बातें आती-जाती हैं

आँखें खुलने से भी पहले
कुछ बातें मन में आतीं हैं
ये बातें कल की बासी शामें
सपने में कह जाती हैं

स्वेटर की जेबों में रखी, रूमाल में बांधी एक सखी की बातें
नक्षत्रों के सन्नाटों में अंकुराती किसी सदी की बातें
समय की निष्ठुर धारा में
वो बातें बिसरी जाती हैं

आँखें खुलने से भी पहले
कुछ बातें मन में आतीं हैं
ये बातें कल की बासी शामें
सपने में कह जाती हैं

जाड़े की धूप में लेटी, घास पर कुछ अलसाती बातें
मध्यम स्वर में कही-सुनी, उन शामों की सकुचाती बातें
बहुत ढूँढने पर भी कोई
शब्द नहीं पाती हैं

आँखें खुलने से भी पहले
कुछ बातें मन में आतीं हैं
ये बातें कल की बासी शामें
सपने में कह जाती हैं

परत-परत खुलती हैं ऐसी प्रेम में लिपटी पाती बातें
चाय की प्याली, हँसीं-ठिठोली, सिगड़ी पर गरमाती बातें
बरसों बीते, बातें फिर भी
याद बहुत आती हैं

आँखें खुलने से भी पहले
कुछ बातें मन में आतीं हैं
ये बातें कल की बासी शामें
सपने में कह जाती हैं

कुछ भाव भरी भीनी-भावुक, भारी सी भर्राती बातें
कहते-सुनते फिर भी कितनी बाक़ी ही रह जाती बातें
काफ़ी कुछ रह जाता है
पर ज़्यादा बातें रह जाती हैं

आँखें खुलने से भी पहले
कुछ बातें मन में आतीं हैं
ये बातें कल की बासी शामें
सपने में कह जाती हैं